संपादकीय

दशहरे के बाद दिल्ली का AQI 245, पटाखों और पराली के बीच फिर घुटने लगी सांसें... हर साल प्रदूषण बढ़ने का इंतज़ार कब तक?

AAasim· 22 Oct, 5:07 PM · 8 मिनट
दशहरे के बाद दिल्ली का AQI 245, पटाखों और पराली के बीच फिर घुटने लगी सांसें... हर साल प्रदूषण बढ़ने का इंतज़ार कब तक?

अमित पांडे: संपादक

दशहरे का जश्न खत्म होते ही दिल्ली की हवा फिर खराब हो गई। 20 अक्टूबर को राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI 179 था, जो अगले दिन बढ़कर 245 पर पहुंच गया। महज 24 घंटे में 66 अंकों की बढ़ोतरी हुई और दिल्ली की हवा 'खराब' श्रेणी में चली गई। हालात देखते हुए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने पूरे दिल्ली-NCR में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) का पहला चरण लागू कर दिया।

लेकिन इस खबर में सबसे चिंताजनक बात सिर्फ AQI का बढ़ना नहीं है। असली सवाल यह है कि दिल्ली में प्रदूषण के खतरनाक मौसम का अंदाज़ा महीनों पहले से होता है, फिर भी हर साल हालात बिगड़ने के बाद आपात कदमों की जरूरत क्यों पड़ती है?

पटाखे, पराली, गाड़ियों का धुआं, सड़क की धूल और मौसम की बदलती परिस्थितियां फिर चर्चा में हैं। सरकार के पास निगरानी की तकनीक है, प्रदूषण के स्रोतों की जानकारी है और उन्हें नियंत्रित करने के नियम भी हैं।

इसके बावजूद साफ हवा का भरोसा अब भी अधूरा है।

क्या दिल्ली में प्रदूषण का ठीकरा सिर्फ पटाखों पर फोड़ा जा सकता है?

दशहरे के दौरान पटाखों से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी का एक कारण हो सकता है। दिल्ली में किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों ने त्योहारों के दौरान पटाखों से निकलने वाले सूक्ष्म कणों और धात्विक तत्वों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की है।

IIT दिल्ली के शोधकर्ताओं ने 2019 से 2021 के बीच दिवाली के प्रदूषण का अध्ययन किया था। 2024 में प्रकाशित शोध के मुताबिक, दिवाली के दौरान PM2.5 में मापे गए तत्वों के द्रव्यमान में पटाखों का योगदान 85 फीसदी से ज्यादा था।

यहां एक फर्क समझना जरूरी है। अध्ययन का यह आंकड़ा कुल PM2.5 प्रदूषण में पटाखों की हिस्सेदारी नहीं बताता। इसे 2026 के दशहरे पर सीधे लागू करना भी वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।

पटाखों से प्रदूषण बढ़ सकता है, लेकिन दिल्ली की पूरी समस्या को केवल पटाखों तक सीमित कर देना अधूरी तस्वीर पेश करेगा।

क्योंकि जिस दिन कोई त्योहार नहीं होता, उस दिन भी दिल्ली की सड़कों पर लाखों वाहन चलते हैं। निर्माण गतिविधियों से धूल उठती है, औद्योगिक उत्सर्जन होता है और कई जगह कचरा जलाया जाता है।

यानी पटाखे प्रदूषण में अचानक बढ़ोतरी कर सकते हैं, लेकिन दिल्ली की नियमित प्रदूषण समस्या को समझने के लिए दूसरे स्रोतों पर भी ध्यान देना होगा।

पराली के मुकाबले गाड़ियों का धुआं कितना बड़ा सवाल है?

दिल्ली के प्रदूषण की चर्चा होते ही पंजाब और हरियाणा के खेतों में पराली जलाने की घटनाएं सुर्खियों में आ जाती हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि पराली जलाने से निकलने वाला धुआं अनुकूल हवाओं के साथ दिल्ली तक पहुंच सकता है। इसकी मात्रा मौसम, आग की घटनाओं और हवा की दिशा के हिसाब से बदलती रहती है।

लेकिन 21 अक्टूबर को उपलब्ध मॉडल आधारित आकलन में दिल्ली के परिवहन क्षेत्र का PM2.5 प्रदूषण में योगदान करीब 20.5 फीसदी बताया गया। पराली का अनुमानित योगदान अलग-अलग समय के पूर्वानुमानों में बदलता दिखाई दिया।

इससे एक अहम सवाल पैदा होता है।

क्या प्रदूषण की बहस में शहर के भीतर मौजूद उन स्रोतों को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है, जिन्हें नियंत्रित करने के लिए स्थानीय प्रशासन के पास सीधे अधिकार हैं?

वाहनों का उत्सर्जन घटाने के लिए सार्वजनिक परिवहन, बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट, प्रदूषण जांच और स्वच्छ तकनीक की जरूरत है। सड़क की धूल कम करने के लिए नियमित सफाई और निर्माण स्थलों पर नियमों का पालन जरूरी है।

इसी तरह पराली जलाने की समस्या का समाधान किसानों को केवल दोषी ठहराकर नहीं निकाला जा सकता। कृषि अवशेषों के प्रबंधन के लिए आर्थिक रूप से व्यावहारिक विकल्प और राज्यों के बीच सहयोग आवश्यक हैं।

दिल्ली की हवा किसी एक राज्य की सीमा में कैद नहीं रहती। इसलिए प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी भी केवल एक सरकार पर नहीं डाली जा सकती।

जब खराब हवा का अनुमान पहले से है, तो इंतजाम कितने असरदार हैं?

यह सही है कि अक्टूबर से सर्दियों की ओर बढ़ते समय मौसम की परिस्थितियां दिल्ली के लिए मुश्किल पैदा करती हैं।

हवा की रफ्तार कम होने और वायुमंडल में प्रदूषकों के फैलने की गुंजाइश घटने पर सूक्ष्म कण निचली परतों में जमा होने लगते हैं।

2026 में 'एटमॉस्फेरिक एनवायरनमेंट' में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी पाया कि नवंबर से जनवरी के दौरान दिल्ली में वायुमंडल की निचली परत की ऊंचाई एक किलोमीटर से कम बनी रह सकती है। अध्ययन में कम ऊंचाई और ज्यादा PM2.5 के बीच संबंध सामने आया।

यह वैज्ञानिक जानकारी नई चुनौती की तरफ नहीं, बल्कि पहले से पहचाने जा चुके खतरे की तरफ इशारा करती है।

सरकार के पक्ष में एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है। दिल्ली सरकार ने जुलाई 2026 में स्थायी विंटर पॉल्यूशन मास्टर प्लान अधिसूचित किया था। इसमें वाहनों के प्रदूषण नियंत्रण, निर्माण गतिविधियों, धूल और दूसरे स्रोतों से जुड़े कई उपाय शामिल हैं।

इसके अलावा GRAP के तहत AQI के अलग-अलग स्तरों पर प्रतिबंध और निगरानी बढ़ाने का प्रावधान भी मौजूद है।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि प्रदूषण रोकने के लिए कोई तैयारी नहीं की गई।

लेकिन तैयारी और प्रभावी नतीजों में फर्क होता है।

अगर नियम मौजूद हैं, तो सवाल होना चाहिए कि कितने निर्माण स्थलों पर उनका पालन हो रहा है, प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई और औद्योगिक उत्सर्जन में वास्तविक कमी कितनी आई।

नीतियों की कामयाबी सिर्फ आदेश जारी करने या जुर्माने की संख्या से नहीं, बल्कि लगातार बेहतर होती हवा से आंकी जानी चाहिए।

खराब हवा की सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है?

जब दिल्ली का AQI 245 होता है, तो उसका असर केवल आसमान के रंग या दूर तक दिखाई देने वाली धुंध तक सीमित नहीं रहता।

भारत के राष्ट्रीय AQI मानकों के मुताबिक, 201 से 300 के बीच वायु गुणवत्ता खराब मानी जाती है। लंबे समय तक ऐसी हवा में रहने से सांस लेने में परेशानी हो सकती है। बच्चे, बुजुर्ग और पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोग विशेष रूप से संवेदनशील हैं।

लेकिन इस संकट का सामाजिक पहलू भी है।

हर व्यक्ति के पास एयर प्यूरीफायर खरीदने, घर से काम करने या प्रदूषण बढ़ने पर बाहर निकलना बंद करने का विकल्प नहीं होता।

एक दिहाड़ी मजदूर, सड़क किनारे काम करने वाला दुकानदार, डिलीवरी कर्मचारी या ट्रैफिक पुलिसकर्मी अपने काम के कारण लंबे समय तक बाहर रह सकता है।

ऐसे लोगों के लिए खराब हवा से बचना केवल व्यक्तिगत सावधानी का सवाल नहीं है।

यहीं प्रदूषण सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ आर्थिक और सामाजिक असमानता का मुद्दा भी बन जाता है। जिन लोगों के पास बचाव के साधन कम हैं, उनके लिए प्रदूषित हवा से दूरी बनाना अधिक मुश्किल हो सकता है।

इसलिए प्रदूषण नियंत्रण की योजना में सिर्फ AQI घटाने का लक्ष्य नहीं, बल्कि सबसे ज्यादा जोखिम उठाने वाले लोगों की सुरक्षा भी शामिल होनी चाहिए।

क्या GRAP लागू करना ही पर्याप्त समाधान है?

GRAP को पूरी तरह नाकाम व्यवस्था कहना उचित नहीं होगा। जब प्रदूषण बढ़ता है, तो निर्माण गतिविधियों, वाहनों, खुले में कचरा जलाने और दूसरे स्रोतों पर अतिरिक्त नियंत्रण जरूरी हो जाता है।

अचानक बदलते मौसम और प्रदूषण के स्तर को देखते हुए ऐसी आपात व्यवस्था की उपयोगिता है।

लेकिन GRAP मूल रूप से बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने का एक प्रतिक्रिया तंत्र है। यह अकेले सालभर पैदा होने वाले उत्सर्जन की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

दिल्ली को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिसमें प्रदूषण बढ़ने से पहले ही नियमित स्रोतों पर नियंत्रण प्रभावी रहे।

इसके लिए तीन बदलाव महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

पहला, वाहन, निर्माण, उद्योग और कचरा जलाने जैसे स्रोतों के लिए स्पष्ट तथा सार्वजनिक रूप से जांचे जा सकने वाले लक्ष्य तय हों।

दूसरा, सरकार हर महीने बताए कि प्रदूषण नियंत्रण पर कितनी कार्रवाई हुई और उससे उत्सर्जन या वायु गुणवत्ता में क्या मापने योग्य सुधार आया।

तीसरा, दिल्ली और पड़ोसी राज्यों के बीच सहयोग केवल पराली के मौसम की बैठकों तक सीमित न रहे। परिवहन, औद्योगिक गतिविधियों और कृषि अवशेषों को लेकर संयुक्त, दीर्घकालिक व्यवस्था विकसित की जाए।

इन उपायों के अपने खर्च और प्रशासनिक चुनौतियां होंगी। लेकिन लगातार प्रदूषित हवा की स्वास्थ्य और आर्थिक कीमत को भी नीति निर्माण में शामिल करना जरूरी है।

दिल्ली को साफ हवा के लिए हर साल सर्दियों का इंतजार क्यों करना पड़े?

21 अक्टूबर को AQI का 245 पर पहुंचना अपने आप में कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है। दिल्ली इससे कहीं ज्यादा गंभीर प्रदूषण का सामना कर चुकी है।

चिंता की बात इस समस्या का बार-बार लौटना है।

जब प्रदूषण के स्रोतों की पहचान हो चुकी है, वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध हैं और सरकारों ने योजनाएं भी बनाई हैं, तो अगला सवाल उनके वास्तविक असर का होना चाहिए।

त्योहारों में पटाखों का इस्तेमाल सीमित करना जरूरी हो सकता है। पराली जलाने की घटनाओं को कम करना भी महत्वपूर्ण है। लेकिन सड़क पर चलते प्रदूषण फैलाने वाले वाहन, निर्माण स्थलों से उठती धूल और नियम तोड़ने वाले उद्योगों को नजरअंदाज करके दिल्ली की हवा साफ नहीं हो सकती।

साफ हवा केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है। यह लोगों की सेहत, कामकाज और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी बुनियादी जरूरत है।

दिल्ली की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि अक्टूबर में हवा खराब क्यों होती है। चुनौती यह है कि इतने वर्षों के अनुभव के बावजूद प्रदूषण नियंत्रण को सालभर प्रभावी कैसे बनाया जाए।

क्योंकि किसी शहर की कामयाबी इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसने प्रदूषण बढ़ने पर कितने प्रतिबंध लगाए, बल्कि इस बात से कि उसके नागरिकों को साल के कितने दिन साफ हवा मिली।

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