संपादकीय

यूरोप की सड़कों पर महंगाई के खिलाफ गुस्सा, आगजनी और लूटपाट... क्या सरकारें जनता का भरोसा खो रही हैं?

AAasim· 21 Oct, 9:15 AM · 5 मिनट
यूरोप की सड़कों पर महंगाई के खिलाफ गुस्सा, आगजनी और लूटपाट... क्या सरकारें जनता का भरोसा खो रही हैं?

अमित पांडे: संपादक

फ्रांस की सड़कों पर लाखों लोग, इटली में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें, बेल्जियम में छात्रों का विरोध और पुर्तगाल में महंगाई के खिलाफ मार्च। यूरोप के अलग-अलग देशों में पिछले कुछ दिनों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे सिर्फ कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं हैं। ये उस आर्थिक बेचैनी की तरफ भी इशारा करती हैं, जिसका सामना आम नागरिक कर रहे हैं।

17 अक्टूबर को फ्रांस में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। यह सरकारी आंकड़ा है, जबकि आयोजकों ने प्रदर्शनकारियों की संख्या करीब आठ लाख बताई। कई जगह शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए, लेकिन कुछ शहरों में हिंसा, लूटपाट और आगजनी ने हालात बिगाड़ दिए। 19 अक्टूबर तक सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, सप्ताहांत के दौरान करीब 2,400 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि प्रदर्शन हिंसक क्यों हुए। बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर क्यों महसूस कर रहे हैं?

महंगाई का संकट सिर्फ बढ़ती कीमतों तक सीमित नहीं

यूरोप की अर्थव्यवस्था को लेकर अक्सर मजबूत संस्थाओं, बेहतर सार्वजनिक सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा की चर्चा होती है। लेकिन इन व्यवस्थाओं के बावजूद जब लोगों की आमदनी और ज़रूरी खर्च के बीच संतुलन बिगड़ने लगता है, तो असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।

यूरोस्टैट के मुताबिक, सितंबर 2026 में यूरो क्षेत्र की सालाना महंगाई दर 3.8 फीसदी पहुंच गई, जो अगस्त में 3.2 फीसदी थी। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी इस उछाल का एक बड़ा कारण रही।

हालांकि, महंगाई के आंकड़े अकेले पूरी कहानी नहीं बताते।

अगर किसी परिवार की आमदनी बढ़ भी रही है, लेकिन घर का किराया, बिजली, यात्रा और दूसरी ज़रूरी चीजों पर उससे ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है, तो उसका आर्थिक दबाव खत्म नहीं होता। यही वजह है कि नागरिकों की वास्तविक आर्थिक स्थिति समझने के लिए सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि वेतन, आवास और सार्वजनिक सुविधाओं को भी देखना होगा।

फ्रांस में हालिया विरोध की शुरुआत स्कूलों में शिक्षकों की कमी और खराब सुविधाओं जैसी शिकायतों से हुई थी। धीरे-धीरे इसमें महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर नाराज़गी भी शामिल हो गई।

यानी जिस आंदोलन को सिर्फ बढ़ती कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन समझा जा रहा है, उसमें शिक्षा और सरकारी प्राथमिकताओं को लेकर भी गंभीर सवाल मौजूद हैं।

क्या सरकारें लोगों की शिकायतों को समय रहते सुन रही हैं?

लोकतंत्र में चुनाव सरकार बनाने का तरीका हैं, लेकिन जनता की नाराज़गी केवल चुनाव के दिन सामने नहीं आती। विरोध-प्रदर्शन भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।

फ्रांस के हालात इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण हैं।

2018 में ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ शुरू हुए 'येलो वेस्ट' आंदोलन ने सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की थी। आठ साल बाद फिर जीवन-यापन की लागत और सामाजिक सुविधाओं को लेकर व्यापक विरोध दिखाई दे रहा है।

इससे यह साबित नहीं होता कि दोनों आंदोलनों की वजहें और परिस्थितियां पूरी तरह समान हैं। लेकिन यह ज़रूर पूछा जा सकता है कि आर्थिक असुरक्षा से पैदा होने वाली शिकायतों का टिकाऊ समाधान तलाशने में सरकारों को इतनी मुश्किल क्यों होती है।

यहां एक दूसरी सच्चाई को समझना भी ज़रूरी है।

सरकारों के पास असीमित संसाधन नहीं हैं। बढ़ता सरकारी कर्ज, ऊर्जा की कीमतें और बजट पर दबाव ऐसे फैसलों को मुश्किल बनाते हैं, जिनमें वेतन, पेंशन या सार्वजनिक सेवाओं पर ज्यादा खर्च करना पड़े।

इसलिए हर प्रदर्शनकारी मांग को तुरंत पूरा कर देना भी हमेशा व्यावहारिक समाधान नहीं होता।

लेकिन संसाधनों की कमी और जनता के प्रति जवाबदेही दो अलग बातें हैं। सरकारें हर मांग स्वीकार नहीं कर सकतीं, मगर उन्हें अपनी प्राथमिकताओं, फैसलों और सीमाओं को स्पष्ट करना चाहिए। नागरिकों को यह महसूस होना चाहिए कि उनकी शिकायतों को सुना जा रहा है।

हिंसा के शोर में कहीं असली सवाल पीछे तो नहीं छूट रहा?

फ्रांस और इटली में प्रदर्शन के दौरान हुई आगजनी, लूटपाट और सरकारी संपत्तियों पर हमलों को किसी भी लोकतांत्रिक तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता।

किसी दुकान को लूटने या ऐतिहासिक इमारत को आग लगाने से महंगाई कम नहीं होती। उल्टा छोटे कारोबारियों, कर्मचारियों और आम नागरिकों को नुकसान उठाना पड़ता है।

लेकिन यहां एक अहम फर्क बनाए रखना होगा।

शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने वाले लाखों नागरिकों और हिंसा में शामिल लोगों को एक ही नज़र से देखना गलत होगा। जिस तरह आर्थिक नाराज़गी हिंसा का लाइसेंस नहीं बन सकती, उसी तरह कुछ लोगों की हिंसा के आधार पर सभी प्रदर्शनकारियों की शिकायतों को खारिज नहीं किया जा सकता।

सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे हिंसा रोकें, निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा करें और कानून के मुताबिक कार्रवाई करें। साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार बना रहे और पुलिस की कार्रवाई जवाबदेह हो।

यही संतुलन लोकतंत्र की असली परीक्षा है।

चुनावी राजनीति में इस गुस्से का क्या मतलब है?

यूरोप के कई देशों में 2027 के दौरान बड़े राष्ट्रीय चुनाव होने हैं। फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव और इटली सहित अन्य देशों में संसदीय चुनावों की तैयारी के बीच आर्थिक असंतोष राजनीतिक बहस का अहम मुद्दा बन सकता है।

ऐसे माहौल में राजनीतिक दल महंगाई, रोजगार, प्रवासन, सुरक्षा और सरकारी खर्च को अलग-अलग तरीके से चुनावी मुद्दा बना सकते हैं।

हालांकि, यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी कि सड़कों पर बढ़ता असंतोष किसी एक राजनीतिक विचारधारा या पार्टी को निश्चित फायदा पहुंचाएगा।

मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग होती हैं। आर्थिक नाराज़गी चुनावी फैसलों को प्रभावित कर सकती है, लेकिन उसके नतीजे राजनीतिक विकल्पों, नेतृत्व और स्थानीय परिस्थितियों पर भी निर्भर करेंगे।

यूरोप की इस बेचैनी से एक व्यापक सबक निकलता है। सरकार की सफलता केवल महंगाई के आंकड़े नियंत्रित करने या हिंसा पर कार्रवाई करने से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि आम नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा और सार्वजनिक सेवाओं में कितना वास्तविक सुधार होता है।

फ्रांस से इटली तक दिखाई दे रही नाराज़गी के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारें जनता की शिकायतों का जवाब ठोस नीतियों से देंगी या बातचीत कानून-व्यवस्था और चुनावी आरोप-प्रत्यारोप तक सिमटकर रह जाएगी।

लोकतंत्र में सड़कों का शांत होना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है उन वजहों का समाधान, जो लोगों को सड़कों पर आने के लिए मजबूर करती हैं।

यह ख़बर दोस्तों तक पहुँचाएँ
शेयर करें

Comments

Leave a comment