शिक्षा

JNU में आरक्षित सीटें गायब! NCSC और NCST ने प्रशासन को दिया सख्त निर्देश

JNU में SC/ST आरक्षित सीटों के गायब होने पर NCSC और NCST ने प्रशासन को फटकार लगाई है। जानें अब क्या होगा।

Sonu Nigam· 30 Oct, 6:51 AM · 2 मिनट
JNU में आरक्षित सीटें गायब! NCSC और NCST ने प्रशासन को दिया सख्त निर्देश

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर विवादों के घेरे में है, लेकिन इस बार मामला प्रशासनिक लापरवाही और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों के 'गायब' होने का गंभीर मामला सामने आया है। इस मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) ने कड़ा रुख अपनाया है और यूनिवर्सिटी प्रशासन से जवाब तलब किया है।

पूरा मामला तब शुरू हुआ जब जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन (JNUSU) के पदाधिकारियों ने आरक्षित सीटों की कमी को लेकर शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद NCSC ने हस्तक्षेप करते हुए प्रशासन को निर्देश दिया है कि वाइवा-वोसे (Viva-Voce) परीक्षाओं से पहले इन गायब सीटों को दोबारा अधिसूचित किया जाए। यदि प्रशासन ऐसा नहीं करता है, तो उसे इन सीटों के गायब होने का ठोस कारण बताना होगा। आयोग ने विश्वविद्यालय प्रशासन को सोमवार को पूछताछ के लिए पेश होने का आदेश भी दिया है।

आरक्षण संवैधानिक अधिकार है, प्रशासनिक उपकार नहीं: JNUSU

वहीं दूसरी ओर, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) ने भी इस मामले में दखल दिया है। आयोग ने यूनिवर्सिटी के इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल (EOC) को तुरंत इस मामले की जांच करने के निर्देश दिए हैं। NCST ने स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जनजाति (ST) की सीटों के आरक्षण को लेकर कुलपति (VC) की जवाबदेही तय की जाएगी।

इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए JNUSU की अध्यक्ष अदिति ने कहा कि आयोगों का हस्तक्षेप जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने मांग की कि प्रशासन तुरंत इन सीटों की समस्या को हल करे ताकि छात्रों के संवैधानिक अधिकारों का हनन न हो। यूनियन की उपाध्यक्ष गोपिका ने तीखा हमला करते हुए कहा कि आरक्षण कोई प्रशासनिक उपकार नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है और यूनिवर्सिटी इस पर चुप्पी नहीं साध सकती।

यूनियन के महासचिव सुनील और संयुक्त सचिव दानिश ने भी प्रशासन की इस चूक को गंभीर बताया है। उनका कहना है कि एक केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा आरक्षण नीतियों के कार्यान्वयन में ऐसी लापरवाही पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है। छात्रों की मांग है कि वाइवा से पहले सभी आरक्षित सीटों का स्पष्ट विवरण दिया जाए ताकि किसी भी योग्य छात्र को उसके हक से वंचित न किया जा सके।

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