सत्ता में आते ही विरोध 'विदेशी साज़िश' क्यों लगने लगता है? इंदिरा से मोदी तक एक जैसी कहानी
लेकिन क्या किसी सरकार के खिलाफ आंदोलन करना देश को अस्थिर करने की कोशिश है? और अगर विरोध के पीछे सचमुच विदेशी ताकतें हैं, तो उनके खिलाफ सबूत सार्वजनिक बहस और कानूनी जांच की कसौटी पर क्यों नहीं रखे जाने चाहिए?

अमित पांडे: संपादक
22 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि जब दुनिया एक नए सिस्टम की तलाश कर रही है, तब कुछ लोग देश में अव्यवस्था का सपना देख रहे हैं। उन्होंने विपक्ष पर भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि खराब करने का आरोप भी लगाया। इससे कुछ दिन पहले बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ होने का दावा किया था।
ये बयान ऐसे वक्त आए हैं, जब देश में NEET पेपर लीक और वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर प्रदर्शन हुए हैं। विपक्ष और प्रदर्शनकारी संगठनों ने परीक्षा व्यवस्था और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं। दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के नेताओं ने इन आंदोलनों की नीयत और उनके कथित बाहरी संबंधों पर सवाल खड़े किए हैं।
लेकिन क्या किसी सरकार के खिलाफ आंदोलन करना देश को अस्थिर करने की कोशिश है? और अगर विरोध के पीछे सचमुच विदेशी ताकतें हैं, तो उनके खिलाफ सबूत सार्वजनिक बहस और कानूनी जांच की कसौटी पर क्यों नहीं रखे जाने चाहिए?
ये सवाल इसलिए भी अहम हैं, क्योंकि भारतीय राजनीति में 'विदेशी हाथ' कोई नया आरोप नहीं है। इंदिरा गांधी की सरकार से लेकर मनमोहन सिंह के दौर और अब नरेंद्र मोदी सरकार तक, अलग-अलग आंदोलनों को लेकर ऐसी बयानबाज़ी सामने आती रही है।
सरकारें बदलीं, विपक्ष बदला, आंदोलन के मुद्दे बदले, लेकिन सत्ता और असहमति के बीच यह तनाव बार-बार लौटता रहा।
1975 में जब जेपी आंदोलन को देश के लिए खतरा बताया गया
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 1975 की इमरजेंसी इसकी सबसे गंभीर मिसाल है।
1974 में बिहार के छात्र आंदोलन से शुरू हुई राजनीतिक बेचैनी धीरे-धीरे जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक बड़े जन आंदोलन में बदल गई। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सरकारी कामकाज को लेकर लोगों में नाराज़गी थी। जेपी ने 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया और इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ विपक्षी ताकतों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई।
इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों का आरोप था कि विपक्ष सरकार और देश की व्यवस्था को ठप करना चाहता है। आंदोलनों के पीछे बाहरी ताकतों की भूमिका होने की बात भी कही गई।
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने जून 2000 में द हिंदू के लिए लिखे अपने लेख में इंदिरा गांधी के राजनीतिक विमर्श में 'विदेशी हाथ' की भूमिका का विस्तार से विश्लेषण किया था।
गुहा ने इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के बयानों का जिक्र करते हुए बताया कि वह विपक्ष की गतिविधियों को देश की स्थिरता और बाहरी खतरे से जोड़कर पेश करती थीं।
25 जून 1975 की रात देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई। विपक्षी नेता गिरफ्तार हुए, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक पाबंदियां लगाई गईं।
हालांकि, इमरजेंसी के पीछे केवल जेपी आंदोलन नहीं था। इलाहाबाद हाईकोर्ट का इंदिरा गांधी के चुनाव को लेकर आया फैसला और तत्कालीन राजनीतिक संकट भी इसकी पृष्ठभूमि का हिस्सा थे।
मार्च 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई और इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गईं।
इस इतिहास से एक बड़ा सबक मिलता है। जब सरकार अपने राजनीतिक अस्तित्व को देश के अस्तित्व के बराबर मानने लगती है, तो उसके लिए विरोध को सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय राष्ट्रीय संकट के रूप में पेश करना आसान हो सकता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि आज के हर विवाद की तुलना इमरजेंसी से कर दी जाए। 1975 में नागरिक अधिकारों पर जिस तरह की औपचारिक और व्यापक पाबंदियां लगी थीं, वे एक अलग ऐतिहासिक परिस्थिति थीं।
2011 में कांग्रेस को भी अन्ना आंदोलन के पीछे दिखा था 'विदेशी हाथ'
करीब तीन दशक बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार को एक बड़े जन आंदोलन का सामना करना पड़ा।
2011 में अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकपाल कानून की मांग को लेकर देशभर में आंदोलन खड़ा किया।
सरकार के खिलाफ लोगों की नाराज़गी सड़कों पर दिखाई देने लगी। हजारों लोग प्रदर्शन में शामिल हुए और आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया।
उस दौर में कांग्रेस के कुछ नेताओं की प्रतिक्रियाएं आज की राजनीतिक बहस से मिलती-जुलती थीं।
कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने अन्ना आंदोलन को लेकर अमेरिकी भूमिका पर सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि अमेरिका ने भारत में ऐसे आंदोलन के बारे में टिप्पणी क्यों की और क्या इसके पीछे देश को अस्थिर करने वाली ताकतें सक्रिय हो सकती हैं।
लेकिन अमेरिका की तत्कालीन विदेश विभाग की प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैंड ने आंदोलन को अमेरिकी समर्थन मिलने संबंधी रिपोर्टों को गलत बताया था। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थन की बात कही थी।
कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने भी अन्ना हजारे और उनकी टीम पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने आंदोलन से जुड़े लोगों की विचारधारा और फंडिंग पर सवाल उठाए, लेकिन बाद में अन्ना हजारे के खिलाफ की गई अपनी व्यक्तिगत टिप्पणियों के लिए लिखित माफ़ी मांगी।
इस दौरान UPA सरकार का रवैया एक जैसा नहीं रहा।
16 अगस्त 2011 को अन्ना हजारे की गिरफ्तारी हुई, जिसका विपक्ष ने तीखा विरोध किया। बाद में सरकार ने आंदोलन के प्रतिनिधियों से बातचीत की और संसद में लोकपाल से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।
यानी एक ही सरकार ने आंदोलन के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई भी की और उससे बातचीत का रास्ता भी अपनाया।
उस समय विपक्ष में बैठी बीजेपी ने अन्ना हजारे की गिरफ्तारी को लोकतांत्रिक अधिकारों का मुद्दा बनाया था। पार्टी के नेताओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा की मांग उठाई।
यहीं राजनीति का एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है।
जिस विरोध के अधिकार को कोई पार्टी विपक्ष में रहते हुए मजबूती से उठाती है, सत्ता में आने के बाद उसी अधिकार को लेकर उसका नजरिया कितना बदलता है?
अब NEET और SIR के खिलाफ आंदोलन पर उठे वही पुराने सवाल
2026 में NEET-UG पेपर लीक ने देश की परीक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।
यह विवाद महज सोशल मीडिया के आरोपों तक सीमित नहीं रहा। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने मई में पेपर लीक से जुड़े मामले में FIR दर्ज की और जांच आगे बढ़ाई।
कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े युवाओं ने परीक्षा में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर प्रदर्शन किए।
इसके बाद वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर विवाद बढ़ा।
विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारी संगठनों का आरोप है कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटने के कारण पात्र वोटरों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
चुनाव आयोग का पक्ष है कि वोटर लिस्ट को सही रखने के लिए मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट और अपात्र मतदाताओं के नामों की जांच जरूरी है। आयोग ने सूची से बाहर रह गए पात्र मतदाताओं के लिए आवेदन और सुधार की प्रक्रिया भी बताई है।
इसलिए SIR से जुड़ी हर शिकायत को पहले से साबित गड़बड़ी मानना सही नहीं होगा। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। अगर किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से कटता है, तो उस समस्या की जांच और समाधान करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है।
इन्हीं सवालों पर अक्टूबर में दिल्ली सहित कई जगह प्रदर्शन हुए।
10 अक्टूबर को बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने विपक्ष और CJP पर विदेशी ताकतों के इशारे पर देश में अस्थिरता फैलाने की कोशिश का आरोप लगाया।
20 अक्टूबर को RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भी विदेशों में हुए विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए बाहरी ताकतों और सत्ता परिवर्तन के नाम पर अस्थिरता पैदा करने की कोशिशों के प्रति सावधान किया। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि लोकतंत्र में समस्याएं और विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक हैं।
22 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष के रवैये को देश की अंतरराष्ट्रीय छवि और राजनीतिक अव्यवस्था से जोड़कर आलोचना की।
इन बयानों से सरकार और सत्ताधारी पक्ष की चिंता सामने आती है। लेकिन यहां एक बुनियादी फर्क करना जरूरी है।
विदेशी दखल की आशंका जताना और किसी खास आंदोलन में विदेशी दखल साबित करना दो अलग बातें हैं।
किस विदेशी संगठन, व्यक्ति या संस्था ने किस तरीके से हस्तक्षेप किया? क्या किसी गैरकानूनी फंडिंग या साज़िश का दस्तावेजी सबूत है? क्या किसी सक्षम जांच एजेंसी ने ऐसी भूमिका स्थापित की है?
इन सवालों का जवाब दिए बिना राजनीतिक आरोप को साबित तथ्य की तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता।
क्या हर आंदोलन को लोकतांत्रिक बताकर उसकी गलतियां नजरअंदाज की जा सकती हैं?
बिल्कुल नहीं।
सरकार के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। अगर किसी आंदोलन में हिंसा होती है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है या लोगों की सुरक्षा को खतरा पैदा होता है, तो प्रशासन को कानून के मुताबिक कार्रवाई करनी चाहिए।
इसी तरह यदि किसी संगठन के खिलाफ विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों के उल्लंघन या गैरकानूनी गतिविधियों के विश्वसनीय सबूत मिलते हैं, तो उसकी जांच जरूरी है।
लेकिन यह कार्रवाई किसी व्यक्ति की राजनीतिक राय के आधार पर नहीं, बल्कि उसके आचरण और उपलब्ध सबूतों के आधार पर होनी चाहिए।
शांतिपूर्वक विरोध करने वाले नागरिकों को उन लोगों से अलग देखना जरूरी है जो हिंसा या गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं।
यही नियम सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों पर लागू होना चाहिए।
विपक्षी दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे हर प्रशासनिक कार्रवाई को तुरंत लोकतंत्र पर हमला न बताएं। उन्हें अपने आरोपों के समर्थन में सबूत देने चाहिए, प्रदर्शन को शांतिपूर्ण रखना चाहिए और सरकारी संस्थाओं पर सवाल उठाते समय तथ्यों की सटीकता बनाए रखनी चाहिए।
लेकिन सरकार की जिम्मेदारी इससे ज्यादा है, क्योंकि कानून लागू करने और नागरिकों की स्वतंत्रता सीमित करने की शक्ति उसी के पास होती है।
संविधान विरोध करने का अधिकार देता है, सरकार गिराने का अनियंत्रित लाइसेंस नहीं
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी और बिना हथियार शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार देता है।
यह अधिकार असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था और देश की संप्रभुता तथा अखंडता जैसे आधारों पर उचित कानूनी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
लेकिन संविधान यह भी नहीं कहता कि सरकार की आलोचना करने के लिए किसी नागरिक को पहले अपनी देशभक्ति साबित करनी होगी।
कोई छात्र परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा सकता है। कोई किसान कृषि नीति का विरोध कर सकता है। कोई कर्मचारी वेतन या नौकरी के मुद्दे पर प्रदर्शन कर सकता है। इसी तरह कोई राजनीतिक दल चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाने का अधिकार रखता है।
इन सवालों से सरकार असहमत हो सकती है। सरकार तथ्यों के साथ आरोपों का जवाब भी दे सकती है।
लेकिन लोकतांत्रिक असहमति और देशविरोधी गतिविधि के बीच फर्क बना रहना चाहिए।
लोकतंत्र में सरकार और देश एक ही चीज नहीं हैं।
सरकार चुनाव से बनती है, उसकी नीतियां बदल सकती हैं और वह अगला चुनाव हार भी सकती है। देश और उसका संविधान किसी एक सरकार या राजनीतिक दल से कहीं बड़े हैं।
इसलिए सरकार से असहमति को देश से दुश्मनी के बराबर मानना लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करता है।
'विदेशी हाथ' का आरोप राजनीतिक रूप से इतना सुविधाजनक क्यों है?
किसी आंदोलन को विदेशी साज़िश बताने से सार्वजनिक बहस की दिशा बदल सकती है।
मूल सवाल अगर पेपर लीक का था, तो चर्चा प्रदर्शनकारियों की फंडिंग पर पहुंच जाती है। मुद्दा वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का था, तो बहस आंदोलनकारियों की नीयत पर केंद्रित हो सकती है। भ्रष्टाचार के आरोपों की जगह यह सवाल बड़ा बनाया जा सकता है कि आंदोलन से किस राजनीतिक दल को फायदा मिलेगा।
इसका मतलब यह नहीं कि फंडिंग या बाहरी प्रभाव की जांच गैरजरूरी है।
समस्या तब होती है, जब इन सवालों का इस्तेमाल मूल शिकायत का जवाब देने के विकल्प के रूप में किया जाए।
यह एक राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन इसका असर वास्तविक शिकायतों को पीछे धकेलना भी हो सकता है।
इसीलिए किसी सरकार को दो अलग जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। पहली, अगर विदेशी हस्तक्षेप या हिंसा के सबूत हैं तो उनकी कानूनी जांच करे। दूसरी, जिस मुद्दे पर लोग विरोध कर रहे हैं, उसका तथ्यात्मक जवाब दे।
एक जिम्मेदारी पूरी करने से दूसरी खत्म नहीं हो जाती।
सत्ता बदलती है, तो क्या लोकतांत्रिक सिद्धांत भी बदल जाते हैं?
1975 में कांग्रेस सरकार के सामने जेपी आंदोलन था। 2011 में UPA सरकार अन्ना हजारे के आंदोलन का सामना कर रही थी। अब मोदी सरकार के दौर में परीक्षा और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं।
इन तीनों आंदोलनों की परिस्थितियां, नेतृत्व और मांगें अलग हैं। उनके पैमाने, राजनीतिक असर और सरकार की प्रतिक्रिया को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
लेकिन इनकी तुलना से यह सवाल जरूर निकलता है कि क्या हमारे राजनीतिक दल विरोध के अधिकार को किसी स्थायी लोकतांत्रिक सिद्धांत की तरह देखते हैं, या सत्ता और विपक्ष में अपनी स्थिति के हिसाब से उसकी व्याख्या करते हैं?
इस सवाल का जवाब केवल बीजेपी या कांग्रेस को नहीं देना चाहिए। हर उस राजनीतिक दल को देना चाहिए जो विपक्ष में रहते हुए नागरिक अधिकारों की बात करता है और सरकार में आने के बाद विरोध से असहज हो जाता है।
लोकतंत्र की असली कसौटी यह नहीं कि किसी पार्टी को अपने समर्थन में होने वाले प्रदर्शन कितने पसंद हैं।
कसौटी यह है कि वह उन नागरिकों के अधिकारों का कितना सम्मान करती है, जो उसकी नीतियों से असहमत हैं।
विदेशी हस्तक्षेप का वास्तविक खतरा हो तो सरकार को उससे निपटना चाहिए। हिंसा हो तो निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन शांतिपूर्ण असहमति को बदनाम करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की भाषा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र को खतरा केवल उन लोगों से नहीं होता जो कानून तोड़ते हैं। खतरा तब भी पैदा हो सकता है, जब सत्ता हर असहज सवाल को देश के खिलाफ साज़िश समझने लगे।
सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं है। और देश से प्रेम का प्रमाण सरकार से सहमत होना भी नहीं हो सकता।