संपादकीय

'बीच का रास्ता अपनाइए'... जस्टिस कौल के खुलासे ने उठाए सवाल, क्या न्यायपालिका के भीतर भी फैसलों पर दबाव बनता है?

इसीलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जस्टिस कौल और जस्टिस चंद्रचूड़ के बीच क्या बातचीत हुई थी। बड़ा सवाल यह है कि देश की सबसे बड़ी अदालत के भीतर संवेदनशील मामलों की सुनवाई, बेंच के गठन और प्रशासनिक फैसलों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।

AAasim· 25 Oct, 11:41 PM · 10 मिनट
'बीच का रास्ता अपनाइए'... जस्टिस कौल के खुलासे ने उठाए सवाल, क्या न्यायपालिका के भीतर भी फैसलों पर दबाव बनता है?

अमित पांडे: संपादक

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को लेकर जो बातें कही हैं, उन्हें महज दो जजों के बीच पुराने मतभेद मानकर नजरअंदाज करना मुश्किल है। जस्टिस कौल का दावा है कि मनी लॉन्ड्रिंग कानून यानी PMLA से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई से पहले तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ ने उन्हें सावधानी बरतने और बीच का रास्ता अपनाने की सलाह दी थी। कौल ने यह भी कहा कि जजों की नियुक्ति में देरी से जुड़ा एक मामला उनकी बेंच से हटा लिया गया था।

ये आरोप अभी स्वतंत्र रूप से साबित नहीं हुए हैं। लेकिन इन्हें सार्वजनिक करने वाला कोई बाहरी राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट का एक पूर्व वरिष्ठ जज है।

इसीलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जस्टिस कौल और जस्टिस चंद्रचूड़ के बीच क्या बातचीत हुई थी। बड़ा सवाल यह है कि देश की सबसे बड़ी अदालत के भीतर संवेदनशील मामलों की सुनवाई, बेंच के गठन और प्रशासनिक फैसलों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।

एक ऐसी संस्था, जिसके फैसलों पर करोड़ों लोगों के अधिकार निर्भर करते हैं, उसके बारे में ऐसे सवाल उठना गंभीर बात है।

PMLA मामले में ऐसा क्या था कि 'बीच का रास्ता' चर्चा में आया?

इस विवाद की पृष्ठभूमि समझना जरूरी है।

जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ मामले में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी PMLA के कई अहम प्रावधानों को बरकरार रखा था।

इनमें प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती से जुड़ी शक्तियां तथा जमानत की सख्त शर्तें शामिल थीं।

इस फैसले की आलोचना करने वालों का तर्क था कि कानून के कुछ प्रावधानों से जांच एजेंसी और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलन बिगड़ सकता है। दूसरी तरफ सरकार का पक्ष था कि मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए सख्त व्यवस्था जरूरी है।

इसके बाद फैसले के कुछ पहलुओं पर दोबारा विचार करने की मांग सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

नवंबर 2023 में जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच इस बात की सुनवाई कर रही थी कि क्या 2022 के फैसले के कुछ मुद्दों को बड़ी बेंच के सामने भेजने की जरूरत है।

इसी सुनवाई से जुड़ी अपनी यादें साझा करते हुए जस्टिस कौल ने पत्रकार करण थापर को बताया कि तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ ने उन्हें अपने चैंबर में बुलाया था।

उनके मुताबिक, उस बातचीत के दौरान जस्टिस संजीव खन्ना भी मौजूद थे। कौल का कहना है कि चंद्रचूड़ ने उन्हें मामले में आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की और सावधानी के साथ बीच का रास्ता अपनाने को कहा।

जस्टिस कौल ने बताया कि उन्होंने पीछे हटने के बजाय सुनवाई जारी रखने का फैसला किया, क्योंकि वह इसे अपनी न्यायिक ईमानदारी से जुड़ा सवाल मानते थे।

यह उनका बताया हुआ घटनाक्रम है। बातचीत का स्वतंत्र रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं है।

लेकिन इससे एक अहम सवाल निकलता है।

अगर किसी जज को अपने सामने लंबित मामले में कानूनी सवालों की जांच जरूरी लगती है, तो उसे किस आधार पर आगे बढ़ना चाहिए? अपने न्यायिक विवेक से, या किसी दूसरे जज की अनौपचारिक सलाह से?

क्या हर सलाह को न्यायिक दबाव कहा जा सकता है?

यहीं जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने से बचना होगा।

सुप्रीम कोर्ट के जजों के बीच कानूनी मुद्दों पर चर्चा होना असामान्य बात नहीं है। अदालत के भीतर आपसी विचार-विमर्श, अलग राय और प्रशासनिक समन्वय न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।

किसी जज को सावधानी बरतने की सलाह देना भी अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता।

खासतौर पर जब मामला पहले से दिए गए तीन जजों के फैसले पर पुनर्विचार और उसे बड़ी बेंच के पास भेजने जैसा संवेदनशील सवाल हो, तो न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सतर्कता की वजह समझी जा सकती है।

पूर्व CJI चंद्रचूड़ के पक्ष में यह सबसे महत्वपूर्ण तर्क है।

लेकिन इस तर्क की भी एक सीमा है।

अगर सलाह केवल कानूनी प्रक्रिया को लेकर थी, तो यह सामान्य न्यायिक संवाद हो सकता है। लेकिन अगर उसका उद्देश्य किसी बेंच को एक खास सवाल सुनने या स्वतंत्र फैसला लेने से रोकना था, तो चिंता कहीं ज्यादा गंभीर हो जाती है।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी से यह तय नहीं किया जा सकता कि उस बातचीत की वास्तविक प्रकृति क्या थी।

इसलिए बिना पूरी तस्वीर सामने आए चंद्रचूड़ पर न्यायिक दबाव बनाने का दोष मढ़ना उचित नहीं होगा।

लेकिन उतना ही जरूरी है कि ऐसी शिकायतों को केवल व्यक्तिगत असहमति बताकर खारिज भी न किया जाए।

जस्टिस कौल की बेंच से मामला हटने पर सवाल क्यों हैं?

जस्टिस कौल ने केवल PMLA की सुनवाई का जिक्र नहीं किया।

उन्होंने जजों की नियुक्ति में देरी से जुड़े एक मामले को अपनी बेंच से हटाए जाने पर भी सवाल उठाया है।

यह मामला इसलिए अहम था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों पर केंद्र सरकार की ओर से नियुक्तियां करने में देरी को लेकर सुनवाई चल रही थी।

नवंबर 2023 में जस्टिस कौल की बेंच ने नियुक्तियों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की थी। लेकिन दिसंबर में निर्धारित तारीख पर मामला उनकी बेंच की कॉज लिस्ट से हटा दिया गया।

उस समय जस्टिस कौल ने अदालत में स्पष्ट किया था कि मामला उन्होंने खुद नहीं हटाया है।

अब अपने संस्मरण और इंटरव्यू में उन्होंने इस घटनाक्रम को लेकर फिर सवाल उठाए हैं।

हालांकि, उन्होंने यह दावा निश्चित रूप से नहीं किया कि केंद्र सरकार ने ही मामला हटवाया था। जब उनसे सरकारी दबाव के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि यह बताना उनके लिए मुश्किल है।

यह फर्क बेहद जरूरी है।

बेंच से मामला हटने की घटना और उसके पीछे किसी राजनीतिक हस्तक्षेप का होना दो अलग बातें हैं। पहली बात का रिकॉर्ड मौजूद है। दूसरी बात के लिए स्वतंत्र सबूत चाहिए।

लेकिन रिकॉर्ड से जुड़ा एक सवाल बना रहता है। जब कोई अहम मामला पहले से एक बेंच सुन रही हो, तो उसके आवंटन में बदलाव का स्पष्ट और भरोसेमंद कारण सामने क्यों नहीं आना चाहिए?

क्या 'मास्टर ऑफ द रोस्टर' की ताकत पर भी सवाल जरूरी हैं?

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस को 'मास्टर ऑफ द रोस्टर' कहा जाता है।

इस व्यवस्था के तहत CJI अलग-अलग जजों की बेंच बनाते हैं और तय करते हैं कि कौन-सा मामला किस बेंच के सामने जाएगा।

इस अधिकार की जरूरत समझी जा सकती है।

देश की सबसे बड़ी अदालत में हजारों मामलों की सुनवाई होती है। जजों की उपलब्धता, काम का बंटवारा, विशेषज्ञता और प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए किसी एक पद पर समन्वय की जिम्मेदारी होना व्यावहारिक व्यवस्था है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब किसी संवेदनशील मामले के आवंटन में बदलाव का कारण स्पष्ट न हो।

ऐसी स्थिति में भले ही फैसला पूरी तरह नियमों के मुताबिक लिया गया हो, उसके बारे में शक और सवाल पैदा हो सकते हैं।

यानी पारदर्शिता की जरूरत सिर्फ गलत फैसलों को रोकने के लिए नहीं है। सही फैसलों को अनावश्यक संदेह से बचाने के लिए भी है।

2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने सार्वजनिक रूप से बेंच आवंटन को लेकर चिंता जताई थी। उसके बाद अदालत में विषय के आधार पर सार्वजनिक रोस्टर की व्यवस्था को ज्यादा महत्व दिया गया।

जस्टिस कौल के ताजा दावे याद दिलाते हैं कि रोस्टर की सार्वजनिक सूची और किसी खास मामले के आवंटन या बदलाव के पीछे की वजह जानना एक ही बात नहीं है।

न्यायपालिका के लिए अगला सुधार इस दूसरे पहलू से भी जुड़ सकता है।

क्या कॉलेजियम की प्रक्रिया भी ज्यादा पारदर्शी होनी चाहिए?

जस्टिस कौल ने अपने संस्मरण Without Fear or Favour में जजों की नियुक्ति से जुड़े मुद्दों पर भी पूर्व CJI चंद्रचूड़ से असहमति जताई है।

उनका कहना है कि सरकार से बातचीत करना अपने आप में गलत नहीं है। सवाल यह है कि बातचीत कब होती है और उसका कॉलेजियम के स्वतंत्र फैसले पर क्या असर पड़ता है।

कौल ने आरोप लगाया कि कुछ मौकों पर कॉलेजियम के औपचारिक विचार-विमर्श से पहले ही सरकार की राय जानने की कोशिश होती थी।

वहीं, चंद्रचूड़ ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए जवाब में कॉलेजियम बैठकों को सम्मानजनक बताया। उन्होंने कहा कि किताब पढ़े बिना वह दावों पर विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दे सकते। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सरकार की भूमिका होती है।

यह बात सही है कि नियुक्तियों में न्यायपालिका और कार्यपालिका, दोनों की संवैधानिक भूमिकाएं हैं।

लेकिन सरकार से सलाह और सरकार की पहले से सहमति हासिल करने में एक अहम फर्क है।

अगर कॉलेजियम की स्वतंत्र चर्चा से पहले ही किसी नाम पर कार्यपालिका की पसंद या नापसंद निर्णायक असर डालने लगे, तो कॉलेजियम की संस्थागत भूमिका कमजोर होने का जोखिम पैदा हो सकता है।

हालांकि, किसी खास नियुक्ति में ऐसा हुआ था या नहीं, इसे स्थापित करने के लिए संबंधित रिकॉर्ड की जरूरत होगी।

इसलिए जस्टिस कौल के दावों को अंतिम फैसला मानने के बजाय कॉलेजियम की प्रक्रिया को और स्पष्ट बनाने की वजह के तौर पर देखा जाना चाहिए।

न्यायपालिका को भरोसा बचाने के लिए क्या करना चाहिए?

इस पूरे विवाद से तीन सवाल सामने आते हैं।

पहला, संवेदनशील मामलों को एक बेंच से दूसरी बेंच में भेजते समय क्या कारण दर्ज और उचित सीमा तक सार्वजनिक किए जाने चाहिए?

दूसरा, क्या न्यायिक नियुक्तियों में सरकार और कॉलेजियम के बीच संवाद का समय और तरीका ज्यादा स्पष्ट होना चाहिए?

तीसरा, क्या जजों की ओर से संस्थागत प्रक्रिया पर उठाए गए गंभीर सवालों की निष्पक्ष समीक्षा के लिए कोई भरोसेमंद व्यवस्था होनी चाहिए?

इन सवालों के जवाब किसी एक पूर्व चीफ जस्टिस की आलोचना या बचाव तक सीमित नहीं होने चाहिए।

संभव है कि किसी बेंच में बदलाव की पूरी तरह उचित प्रशासनिक वजह रही हो। यह भी संभव है कि किसी चर्चा को एक जज ने सामान्य सलाह समझा हो और दूसरे ने उसे अनुचित हस्तक्षेप माना हो।

इसीलिए व्यक्ति की याददाश्त या व्याख्या के साथ दस्तावेजी रिकॉर्ड को भी महत्व देना जरूरी है।

इस दिशा में एक व्यावहारिक कदम यह हो सकता है कि पहले से सुनवाई कर रही बेंच से किसी अहम मामले को हटाने पर प्रशासनिक कारण रिकॉर्ड किए जाएं और जहां गोपनीयता या न्यायिक हित बाधा न बनें, वहां उनका पर्याप्त विवरण सार्वजनिक किया जाए।

इसी तरह कॉलेजियम के फैसलों के साथ प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ाने के उपायों पर भी विचार होना चाहिए।

यह जरूरी नहीं कि हर आंतरिक बातचीत सार्वजनिक की जाए। जजों को स्वतंत्र और खुलकर कानूनी विचार-विमर्श करने की जगह भी चाहिए।

मगर प्रशासनिक निर्णयों की जवाबदेही और न्यायिक विचार-विमर्श की गोपनीयता के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।

सवाल चंद्रचूड़ बनाम कौल का नहीं, न्यायपालिका पर जनता के भरोसे का है

जस्टिस संजय किशन कौल के दावों से पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ के खिलाफ कोई न्यायिक दोषसिद्धि स्थापित नहीं होती। इसी तरह इन आरोपों पर पूरा रिकॉर्ड सामने आए बिना उन्हें बेबुनियाद घोषित करना भी उचित नहीं होगा।

इस विवाद की अहमियत इसलिए है कि यह न्यायपालिका की उस आंतरिक व्यवस्था को चर्चा में लाता है, जिसके फैसले आम नागरिकों को सीधे दिखाई नहीं देते।

अदालतें सरकारों से जवाब मांगती हैं। प्रशासनिक फैसलों की समीक्षा करती हैं। संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी निभाती हैं।

ऐसे में न्यायपालिका की अपनी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को भी भरोसेमंद और जवाबदेह होना चाहिए।

न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब केवल सरकार से स्वतंत्र होकर फैसले सुनाना नहीं है। इसका एक पहलू यह भी है कि कोई जज अपने सामने आए मामले पर कानून और सबूतों के आधार पर बिना अनुचित हस्तक्षेप के विचार कर सके।

जस्टिस कौल के दावों की पूरी सच्चाई सामने आना बाकी है। लेकिन उन्होंने जिस बहस को फिर सामने ला दिया है, वह किसी एक जज के रिटायरमेंट के साथ खत्म नहीं होनी चाहिए।

क्योंकि न्यायपालिका पर भरोसा सिर्फ इस बात से नहीं बनता कि अदालत क्या फैसला सुनाती है। भरोसा इस बात से भी बनता है कि फैसला सुनाने वाली बेंच कैसे बनी, सुनवाई कैसे आगे बढ़ी और पूरी प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष दिखाई देती है।

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