सिंधु जल संधि विवाद: भारत के राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को प्राथमिकता देने का समय, विश्लेषण
सिंधु जल संधि को स्थगित करने के भारत के फैसले पर ICPS का विश्लेषण। जानिए क्यों अब राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास प्राथमिकता हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर दशकों से चली आ रही सिंधु जल संधि (IWT) अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पीस स्टडीज (ICPS) के एक ताजा विश्लेषण में यह बात सामने आई है कि भारत ने इस संधि को स्थगित करने का जो फैसला लिया है, वह केवल पानी के मुद्दे पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पारस्परिकता और दीर्घकालिक विकास हितों से प्रेरित है।
डॉ मोहम्मद उस्मान भट्टी द्वारा लिखित एक इश्यू ब्रीफ 'द इंडस वाटर्स ट्रीटी एट क्रॉसरोड्स' में बताया गया है कि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि ने रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों को भारत को सौंपा था, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियाँ मुख्य रूप से पाकिस्तान के हिस्से में गई थीं। इस व्यवस्था के तहत पाकिस्तान को बेसिन के लगभग 80 प्रतिशत पानी मिला, जबकि भारत ने पश्चिमी नदियों पर भंडारण और जलविद्युत विकास पर कई पाबंदियां स्वीकार कीं। इतना ही नहीं, भारत ने इस बुनियादी ढांचे के लिए 174 मिलियन अमेरिकी डॉलर का वित्तीय योगदान भी दिया था।
बदलते हालात और सुरक्षा की चुनौती
विश्लेषण में तर्क दिया गया है कि पिछले छह दशकों में परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। भारत के लिए अब केवल पानी का बंटवारा मुद्दा नहीं है, बल्कि सीमा पार से होने वाला आतंकवाद एक बड़ी चुनौती बन गया है। विशेष रूप से पहलगाम आतंकी हमले के बाद 23 अप्रैल 2025 को भारत ने इस संधि को स्थगित करने का कदम उठाया। भारत का स्पष्ट रुख है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग को विश्वास के माहौल से अलग नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि पाकिस्तान ने किशनगंगा और रतले जैसी परियोजनाओं पर लगातार आपत्तियां जताई हैं, जबकि भारत का मानना है कि ये परियोजनाएं संधि के नियमों के दायरे में हैं। भारत का यह फैसला संधि से पूरी तरह हटने का नहीं है, बल्कि सहयोग की बहाली को इस शर्त से जोड़ा गया है कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और स्थायी रूप से खत्म करे।
आगे की राह देखते हुए, विश्लेषण में सुझाव दिया गया है कि भारत को अपनी नदी जल प्रबंधन रणनीति को खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संक्रमण और बुनियादी ढांचे के विस्तार जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ जोड़ना चाहिए। इसमें जल संसाधनों के कानूनी उपयोग को अधिकतम करने, हाइड्रोलॉजिकल डेटा को मजबूत करने और जलवायु परिवर्तन के जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन करने की सिफारिश की गई है। अंततः, यह स्पष्ट है कि सिंधु जल संधि को अब क्षेत्रीय सुरक्षा और पर्यावरणीय वास्तविकताओं से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता।